Saturday, October 31, 2015

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झूलों में बच्चे देखने का मन है।
चक्कर खाते , लकड़ी के घोड़ों पे उचकते बच्चे।
मेले देखने का मन है जहाँ काफी बालहठ के बाद
निशाने वाले की दुकान पर
या चाटवाले के पास
सुख कई शक्लों में मिलता था 

Tuesday, October 6, 2015

जब ज़मीन खिसकी तो लगा के शायद आसमान पे पाँव  रख कर चल लेंगे।  वो न हुआ।  नयी ज़मीन कहाँ से खोजी जाये।  पीछे मुड़ने का रास्ता खुला है मगर वहां से भाग कर जो इतनी दूर आया उसका हासिल? आगे खुला मैदान है , कोई रास्ता होता तो पकड़ कर चल भी लेता।

माज़ी चीज़ बुरी है।
एक पूरी दुनिआ होती है उसके अंदर।
नींद की तरह।
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मैं सपना देखना चाहता हूँ
एक नयी सुबह का
जब मैं सब कुछ पहली बार देख पाउँगा। 

Sunday, September 13, 2015

Aibak

लिहाफ है 
तो ठंढ का अंदाजा भी कम है 

उसकी कब्र तो सदियों से आसमानों पे खुलती होगी 
वो फिर भी खुला है 
मैं अपने ही जिस्म में दफन 
वो ग़ुलाम जो आज़ाद हुआ 
बादशाह बना 
मैं आज़ाद था गुलाम हूँ 
.... 

मैं शायद मिलूं उसे 
उसकी कब्र पर 

बात उठेगी तो आसमान भर जायेगा 

---ऐबक----------------

Sunday, September 6, 2015

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अपने बचपन से पीछा छुड़ाए बिना वयस्क होना मुश्किल है
जो अपने घर से भागता है
बेहतर बड़ा होता है
जो घर कंधे पर लिए घूमता है
उसके लिए हर इंसान में अपना कोई रिश्तेदार अटका पड़ा होता है


आपका कल, आपका माज़ी कई सौ सालों का है
आपका आज उसकी छाया  में सहमा पड़ा बैठा है
उसको पास बिठाओ और बोलो दोस्त

भागो , इस छाया के बाहर  बहुत बड़ी दुनिया है. 

Wednesday, August 26, 2015

क्या होता है जब कोई भट्टी की तरह तपता है
मैं अपनी भट्ठी की खाख हूँ
खुद का जला हुआ हूँ

चुप्पी की आग देखी है
उस आग में हर एक शह एक एक कर के
डाल दी
जो देखा उसे महसूस किया
जो चुभा उसपर बोला

चुप करा दिया गया
या खुद चुप हो गया
ताकि रह सकूँ बाकि गूंगो के साथ

अब उनसे भी बात नहीं कर पाता हूँ 

Wednesday, August 19, 2015

Muhabbat ke baad

आमेर का किला ; किले के पास हवा से कांपती झील. किले के पीछे शाम के धुंधलके में नीली पड़ती पहाड़ियां।

तुमने कहा था " मुहब्बत का इससे आगे कोई मुकाम नहीं है।  इस शाम जो भी बीत  रहा है वो मुहब्बत की हद है " .
ठंढ के लिहाफ में लिपटे हुए मैंने तुम्हारे कंधे पर सर रख कर उस किले के डूबते चेहरे पर अपनी कई उम्रें चस्प कर दी थी।
वो चेहरा डूब गया. वो शाम फिर वापस नहीं आई.

हम मिले. कई अलग अलग जगहों में।  कई मुख्तलिफ तरीकों से। चिट्ठियां skipe chat email …

कई अलग लोगों से इश्क़ भी किया , मौसम के साथ उतार भी दिया मगर तुमसे बात बंद नहीं की।

शायद तुम्हें भी ये एहसास हुआ हो के कुछ लोगों के साथ मुहब्बत के बाद का वक़्त भी बर्दाश्त किया जा सकता है.

आज कई सालों के बाद आमेर का रुख किया. वो जगह कुछ बदल गयी है , कुछ मैं बदल गयी हूँ मगर लब्बोलुबाब ये है की बात फिर उसी जगह से शुरू की जहाँ छोड़ी थी, और फिर घंटो गपियाते गये। बस इस बार तुम नहीं थे।

दिल्ली आ रहे हो तो लिखना , तुम्हारी माँ से मुलाकात हुई थी कुछ दिन पहले। तुम्हारा चेहरा छाप कर ले आई वहां से।
शायद ये खत भी न भेजूं तुम्हें।

बराए इश्क़
अ 

Saturday, July 18, 2015

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ट्रैन का दरवाज़ा खुलता है
और जैसे घुटे हुए फेफड़े में सांस भरती है
ऐसे भक्क से भीड़ घुस जाती है

बुढऊ लोग कोना वाला सीट पे सेट हो जाता है
कपल लोग स्टील वाला खम्भा के एन्ने ओन्ने घुमते रहता है

खियाइल मजदूर लोग झोला उला में ड्रिल मशीन डाले
बंद चेहरा से फ़ोन तलाशता है
गाना ऊना खोजता है

लोहे के रेल पर फिसलते डब्बे में
अलग अलग कोने में
आदमी लोग अपना अपना घर खोज लेता है

किनारे में जम जाता है आदमी लोग धूल मिटटी के जैसा