Sunday, September 13, 2015

Aibak

लिहाफ है 
तो ठंढ का अंदाजा भी कम है 

उसकी कब्र तो सदियों से आसमानों पे खुलती होगी 
वो फिर भी खुला है 
मैं अपने ही जिस्म में दफन 
वो ग़ुलाम जो आज़ाद हुआ 
बादशाह बना 
मैं आज़ाद था गुलाम हूँ 
.... 

मैं शायद मिलूं उसे 
उसकी कब्र पर 

बात उठेगी तो आसमान भर जायेगा 

---ऐबक----------------

Sunday, September 6, 2015

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अपने बचपन से पीछा छुड़ाए बिना वयस्क होना मुश्किल है
जो अपने घर से भागता है
बेहतर बड़ा होता है
जो घर कंधे पर लिए घूमता है
उसके लिए हर इंसान में अपना कोई रिश्तेदार अटका पड़ा होता है


आपका कल, आपका माज़ी कई सौ सालों का है
आपका आज उसकी छाया  में सहमा पड़ा बैठा है
उसको पास बिठाओ और बोलो दोस्त

भागो , इस छाया के बाहर  बहुत बड़ी दुनिया है.