Wednesday, August 19, 2015

Muhabbat ke baad

आमेर का किला ; किले के पास हवा से कांपती झील. किले के पीछे शाम के धुंधलके में नीली पड़ती पहाड़ियां।

तुमने कहा था " मुहब्बत का इससे आगे कोई मुकाम नहीं है।  इस शाम जो भी बीत  रहा है वो मुहब्बत की हद है " .
ठंढ के लिहाफ में लिपटे हुए मैंने तुम्हारे कंधे पर सर रख कर उस किले के डूबते चेहरे पर अपनी कई उम्रें चस्प कर दी थी।
वो चेहरा डूब गया. वो शाम फिर वापस नहीं आई.

हम मिले. कई अलग अलग जगहों में।  कई मुख्तलिफ तरीकों से। चिट्ठियां skipe chat email …

कई अलग लोगों से इश्क़ भी किया , मौसम के साथ उतार भी दिया मगर तुमसे बात बंद नहीं की।

शायद तुम्हें भी ये एहसास हुआ हो के कुछ लोगों के साथ मुहब्बत के बाद का वक़्त भी बर्दाश्त किया जा सकता है.

आज कई सालों के बाद आमेर का रुख किया. वो जगह कुछ बदल गयी है , कुछ मैं बदल गयी हूँ मगर लब्बोलुबाब ये है की बात फिर उसी जगह से शुरू की जहाँ छोड़ी थी, और फिर घंटो गपियाते गये। बस इस बार तुम नहीं थे।

दिल्ली आ रहे हो तो लिखना , तुम्हारी माँ से मुलाकात हुई थी कुछ दिन पहले। तुम्हारा चेहरा छाप कर ले आई वहां से।
शायद ये खत भी न भेजूं तुम्हें।

बराए इश्क़
अ 

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