Sunday, September 13, 2015

Aibak

लिहाफ है 
तो ठंढ का अंदाजा भी कम है 

उसकी कब्र तो सदियों से आसमानों पे खुलती होगी 
वो फिर भी खुला है 
मैं अपने ही जिस्म में दफन 
वो ग़ुलाम जो आज़ाद हुआ 
बादशाह बना 
मैं आज़ाद था गुलाम हूँ 
.... 

मैं शायद मिलूं उसे 
उसकी कब्र पर 

बात उठेगी तो आसमान भर जायेगा 

---ऐबक----------------

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