लिहाफ है
तो ठंढ का अंदाजा भी कम है
उसकी कब्र तो सदियों से आसमानों पे खुलती होगी
वो फिर भी खुला है
मैं अपने ही जिस्म में दफन
वो ग़ुलाम जो आज़ाद हुआ
बादशाह बना
मैं आज़ाद था गुलाम हूँ
....
मैं शायद मिलूं उसे
उसकी कब्र पर
बात उठेगी तो आसमान भर जायेगा
---ऐबक----------------
No comments:
Post a Comment