Saturday, April 18, 2015

udaas ranginiyan

उदय शंकर के ब्लॉग तिरछी स्पेलिंग का एक तक्ख्ल्लुस "अनहोनी मौसम की उदास रंगीनियाँ भी है।
धनबाद जहाँ मैं पला बढ़ा , और जिस मूड में पला बढ़ा , उसका माकूल डिस्क्रिप्शन भी ये शब्द "उदास रंगीनियाँ " है। पूजा के मेले जत्रे में गुम हुई वो उदास रंगीनियाँ मुझे बागा के कवाला होटल में फिर से मिलती है और एंड्रिया बोसेल्ली की गहरी आवाज़ की तरह फ़ैल जाती हैं. एरिक क्लैप्टन और टेरेसा तंग की धुनें जिनके साथ व्हिस्की की एक पेग गटक कर साँझा तो हो जाता हूँ  मगर गानों के बोल नहीं पकड़ पाता।

आज कई दिनों के बाद हिरोशिमा मोन आमोर देख कर फिर वो उदास रंगीनियाँ याद हो आई हैं। उनमें गुफ्तगू है , ज़ेहनी गुफ्तगू है जो कई बार हर उस शह को ज़िंदा करती है जिसे कभी देख कर गर्दन घुमा ली थी।
बातों में खर्च किआ हुआ खुद बटोरते हुए हमसफ़र के नाम एक जाम उठा कर शाम से ओझल होने की कोशिशें की हैं। 

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