Saturday, April 18, 2015

मन माहौल चाहता है
जब नहीं मिलता है तब कीचुआ जाता है
मन भागना चाहता है
यहाँ नहीं रहना चाहता है , झेला जाता है
मगर इतना जानता है की साले को हर
हर जगह ईहे मुसीबत है
मन चाहता है की जोड़ीदार मिले
जब जोड़ीदार जैसा कुछ मिलता है तो फिर कीचुआ जाता है
मन को बड़ा होने में बहुते टाइम लग जायेगा


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लोग जगह ऐसे देखता है जैसे टीवी में देख रहा है
वही सब कुछ है बस सामने पिक्चर चेंज हो रहा है
काहे घूमता है लोग बेमतलब्बे
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udaas ranginiyan

उदय शंकर के ब्लॉग तिरछी स्पेलिंग का एक तक्ख्ल्लुस "अनहोनी मौसम की उदास रंगीनियाँ भी है।
धनबाद जहाँ मैं पला बढ़ा , और जिस मूड में पला बढ़ा , उसका माकूल डिस्क्रिप्शन भी ये शब्द "उदास रंगीनियाँ " है। पूजा के मेले जत्रे में गुम हुई वो उदास रंगीनियाँ मुझे बागा के कवाला होटल में फिर से मिलती है और एंड्रिया बोसेल्ली की गहरी आवाज़ की तरह फ़ैल जाती हैं. एरिक क्लैप्टन और टेरेसा तंग की धुनें जिनके साथ व्हिस्की की एक पेग गटक कर साँझा तो हो जाता हूँ  मगर गानों के बोल नहीं पकड़ पाता।

आज कई दिनों के बाद हिरोशिमा मोन आमोर देख कर फिर वो उदास रंगीनियाँ याद हो आई हैं। उनमें गुफ्तगू है , ज़ेहनी गुफ्तगू है जो कई बार हर उस शह को ज़िंदा करती है जिसे कभी देख कर गर्दन घुमा ली थी।
बातों में खर्च किआ हुआ खुद बटोरते हुए हमसफ़र के नाम एक जाम उठा कर शाम से ओझल होने की कोशिशें की हैं। 

Wednesday, April 8, 2015

जीनत अमान ता तुम भी नहीं हो
हमसे कहे राजेश खन्ना बनने का उम्मीद कइले हो

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लाइन मिलना कपिटलिस्टिक समाज का उँडेरकररेंट है।
जब आप रिलेशनशिप को एक लिमिटेड कमोडिटी बना देते हैं तो लाइन मिलना एक घटना हो जाती है
ज़िंदगी में होना और घटना का फ़र्क़ सामाजिक क्रिया है।

a tragedy is always first a tragedy and then a farce
मोन्टू नाम है
मोछ  पर ताव देते हैं 
दिल पर घाव देते हैं। 

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कई साल बाद मोंटू फिर मिला
मोछ तो नहीं है पर दिल पर घाव देने वाली अदा आज भी है
उसका जादू भी है

बस जादू से यकीन हट गया है 



Naaraj sawera hai

कहाँ से आये बदरा 
घुलता जाये कजरा 

हेमंती शुक्ल येसुदास के साथ गाती हैं।  थोड़ा ac टाइप मौसम इधर भी है। एक लड़की है जो हमको छोड़कर जा नहीं सकती है, साले को, रह भी नहीं सकती है। 

फजूल आदमी से इश्क़ भी फजूल जाता है। 

कहाँ से आये बदरा 
सुधिजन

बहोत टेम हो गया गलचाद्दर किये हुए तो आदतन फिर से वापस हैं

कहानी टोहियाने का बहुत कोसिस किये हैं , जो हाथ लगा है उसमें से एक एक कर के बतावेंगे

पहिला है पाठक जी का लघुशंका

तो पाठक जी हमारे पुराने मित्र हैं कालेज के. जिला बेगुसराई के रहवासी हैं. हम सब से उम्र में बूढ़. मोच तोच पका के आये थे कॉलेज।  १स्त ईयर का हॉस्टल था और फ्लोर के दुन्नो तरफ बाथरूम उथरूम था जिसका लाइट लड़का लोग होली में फोड़ दिया था। पाठक अँधेरा से डरते थे और हॉस्टल में ऐसा प्राणी का लोग खोज में रहता है।  गए एक दिन पाठक जी रतिया में हगने की कवनो एक बाल्टी पानी उनका उपरे उझल दिया। जब तक पाठकजी धोती टोटी समेत के बहार निकलते तब तक मुलजिम फरार।

उस दिन के बाद से पाठक जी रात में हगने मूतने के लिए कंपनी खोजने लगे।  कुछ दिन आदमी प्रतिष्ठा में प्राण गवाया उसका बाद गरियावे लगा पाठक जी के।  " माउग हैं का महराज", "इतना का फट ता है" बोल बोल के पब्लिक लेवे लगा। पाठक जी हिचकने लगे औ फिर केकरो बोलना तोलना बंद कर दिए। करे का फिर। सामने एक ठो बंगलिआ के रूम था।  नाम सोमक। रात में ओक्कर रूम के सामने पाठक जी मूत के काम चला लेते थे। सोमकवा भोरे भोरे दरवजवा खोले की मारे भभका। एक दिन सोमकवा के झाँट झरकिस औ बोला के सल्ला रात भर जगल रहेंगे औ खोजेंगे के कौन बहिँचो हमर दरवाजा पर मूत के जाता है।  रतिया हुआ लाइट गुल। पाठक जी उठे दरवाजा खोले, धोतियाँ हटाये बस की इतना में दरवाजा खुला औ सोमकवा सामने।  धरा पाठकवा के औ जड़ दिहिस। पाठक गड़बड़ाये औ पब्लिक के जमा किये। एसोसिएशन के सब थो नेता लोग जैम गिया।  फैसला हुआ की मार किया जाये। मार कम हुआ बकैती जादे हुआ। बर्डेन पुलिस बोलाइस आ पुलिस दुन्नो साइड पब्लिक का धरा औ थाना ले गया।  पब्लिक साझा सुलह किआ, झुट्ठो के गाला टला मिला औ चंदा उन्दा कर के गया छोडाबे। आदमी लोग आया , सब का फ़ोन टन पर्स तरस पुलिस रख लिहिस था।  मीटिंग बैठा और पाठक के चेता दिया गया की सेल आप केकरो दरवजवा पर ऐसेही जा के मूत नहीं सकते हैं।
फिर से बहिँचो स्क्वायर वन. मूता किधर जाये।
बस आज इतने है। . डेरा जाइये  अगला पार्ट बाद में सुनाबेंगे।