बर्मा जी आये हुए थे. उनके फिल्म का स्क्रीनिंग था तो हम भी गए. एनीमेशन में कहानी खूबसूरती से कहने के गुर दिखे मगर कहानी नहीं दिखि. अतशयोक्ति नहीं होगी मगर उस पूरे पैनल में बस वर्मा जी की कहानी में थोड़ा रेस्ट्राइन थोड़ा सबटेक्सट दिखा बाकि सब हगने पे आमादा थे. लगा कोई भी कैमरा पकड़ के हेंच ले और एक पिक्चर निकल जाए.कैमरा किनते आदमी फिल्मकार हो जाता है. पोजीसन लेने का पूरा जल्दी है. फिल्मकार कहलाने का पूरा जल्दी है.…… मजा नहीं आया ता दुन्नु गोटे भागे उधर से. ज़ाग्रेब से लौट कर आने के बाद बर्मा जी कचरा देखने से सतर्क हैं. एक बढ़िया आर्टिस्ट की शुरुआत हो गयी है। यहाँ तो आधा पब्लिक हग्गे में और काम में फरक महसूस नहीं कर पता है काहेकि कोई थ्योरेटिकल फ्रेमवर्क नहीं है और न कोई ऑब्जेक्टिव पैमाना है, और जो सब्जेक्टिव पैमाना है उसपे क्या बकर करें.
बर्मा जी बोले हैं की अपना कलेक्सन भर बढ़िया एनीमेशन दिखाएंगे। हम भी बेसब्र हो रहे हैं. कुछ नया काफी बक्त से देखे नहीं है बकचोदी देखते देखते मन कीचुआ गया है. तीन दिन छुट्टी है. अपना भी काम का बोझ है मगर नया जब भी कुछ दिखे....त ready when you are....
बर्मा जी बोले हैं की अपना कलेक्सन भर बढ़िया एनीमेशन दिखाएंगे। हम भी बेसब्र हो रहे हैं. कुछ नया काफी बक्त से देखे नहीं है बकचोदी देखते देखते मन कीचुआ गया है. तीन दिन छुट्टी है. अपना भी काम का बोझ है मगर नया जब भी कुछ दिखे....त ready when you are....
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