Saturday, October 31, 2015

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झूलों में बच्चे देखने का मन है।
चक्कर खाते , लकड़ी के घोड़ों पे उचकते बच्चे।
मेले देखने का मन है जहाँ काफी बालहठ के बाद
निशाने वाले की दुकान पर
या चाटवाले के पास
सुख कई शक्लों में मिलता था 

Tuesday, October 6, 2015

जब ज़मीन खिसकी तो लगा के शायद आसमान पे पाँव  रख कर चल लेंगे।  वो न हुआ।  नयी ज़मीन कहाँ से खोजी जाये।  पीछे मुड़ने का रास्ता खुला है मगर वहां से भाग कर जो इतनी दूर आया उसका हासिल? आगे खुला मैदान है , कोई रास्ता होता तो पकड़ कर चल भी लेता।

माज़ी चीज़ बुरी है।
एक पूरी दुनिआ होती है उसके अंदर।
नींद की तरह।
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मैं सपना देखना चाहता हूँ
एक नयी सुबह का
जब मैं सब कुछ पहली बार देख पाउँगा।