आज कल मिजाज मस्त है. तस्वीर बनाने और उधेड़ने की पड़ताल में सनीचर रविवार एक किया जा रहा है. कवनो दूसरा उपक्रम है नहीं तो ये काम भी है और टेम्पास भी. कई महीने पहले john alberts की interaction of color और Jean Baudrillard की the system of objects एक साथ पढ़ते हुए ये कई झोल हुए की image के consumption और production पर एक बार साझा तौर पर बकदलेली की जाये। Baudrillard का serial और model का argument कालांतर में Simulcra का आर्गुमेंट बन जाता है जहाँ वो इमेज को pattern में देखने की बात करते हैं. स्पेस का production और कंसम्पशन एक साथ होना उनके गुरु lefebre का मंतव्य था मगर baudrillard के रहते रहते इंस्टाग्राम और पिंट्रेस्ट जैसे माध्यमों पर इमेज का प्रोडक्शन और कंसम्पशन एक साथ हो रहा है और ससुरी मजे की बात ये है की प्रोडक्शन भी डेटा है और कंसम्पशन भी याने के कालांतर में (या अभी) इमेज को एक पैटर्न में, एक सीरियल के तहत देखा जा सकता है।
दो सप्ताह मगजमारी कर के यही दलील आई है तो ज्यों का त्यों रेफरेन्स उफरेन्स दाल कर के उलट दिया जायेगा, महीने भर के बाद R पर फाइट मार के कुछो इमेज प्रोसेसिंग का कोड ठोका जायेगा।
बाकि हमरे सपने में नैय्यारा नूर आती रहती हैं और कहती रहती हैं की कहे मरवा रहे हो, भटको दुनिआ लउको।औ हम kafkana हो कर कहते हैं की खिड़की खोल दिए हैं , जटिंगा फतिंगा जउन आबे के है आये। मगर ये है जिए बिना जानने से बड़ा दूसरा कौनो पाप नहीं है
चलिए हमरो लम्बर आवेगा।
दो सप्ताह मगजमारी कर के यही दलील आई है तो ज्यों का त्यों रेफरेन्स उफरेन्स दाल कर के उलट दिया जायेगा, महीने भर के बाद R पर फाइट मार के कुछो इमेज प्रोसेसिंग का कोड ठोका जायेगा।
बाकि हमरे सपने में नैय्यारा नूर आती रहती हैं और कहती रहती हैं की कहे मरवा रहे हो, भटको दुनिआ लउको।औ हम kafkana हो कर कहते हैं की खिड़की खोल दिए हैं , जटिंगा फतिंगा जउन आबे के है आये। मगर ये है जिए बिना जानने से बड़ा दूसरा कौनो पाप नहीं है
चलिए हमरो लम्बर आवेगा।